GSEB Std 11 Hindi Textbook Solutions Aaroh Chapter 11 हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौराना
Gujarat Board GSEB Std 11 Hindi Textbook Solutions Aaroh Chapter 11 हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौराना Textbook Exercise Important Questions and Answers, Notes Pdf.
GSEB Std 11 Hindi Textbook Solutions Aaroh Chapter 11 हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौराना
GSEB Class 11 Hindi Solutions हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौरानाप Textbook Questions and Answers
अभ्यास
कविता के साथ :
प्रश्न 1.
कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है । इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिये हैं ?
उत्तर :
कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है । इसके समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित तर्क दिये हैं –
- संसार में सर्वत्र एक ही पवन और एक ही पानी है ।
- सब में एक ही ज्योति समाई है ।
- एक ही मिट्टी से सब बर्तन बने हुए हैं ।
- इन बर्तनों (अंश) को बनानेवाला कुम्हार (अंशी) भी एक ही है ।
- सभी जीवों में एक ही ईश्वर विद्यमान है, फिर वह जीव चाहे किसी भी रूप में हो ।
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प्रश्न 2.
मानव-शरीर का निर्माण किन पंच तत्त्वों से हुआ माना जाता है ?
उत्तर :
मानव-शरीर का निर्माण निम्न पंच तत्त्वों से हुआ माना जाता है –
- अग्नि
- वायु
- जल
- मिट्टी
- आकाश
प्रश्न 3.
‘जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनिन काटै कोई ।
सब घटि अंतरि तूहि व्यापक धरै सरूपै सोई ।।
इसके आधार पर बताइए कि कबीर की दृष्टि में ईश्वर का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :
कबीर ने ईश्वर का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए बढ़ई और काष्ठ का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया है । उनके मतानुसार जिस प्रकार बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है, मगर उसके भीतर की आग को नहीं काट सकता । लकड़ी के अलग-अलग टुकड़ों में भी आग का गुण रहेगा ही । उसी प्रकार सभी मनुष्य के भीतर ईश्वर बसता है । उसका शरीर नष्ट होने पर भी आत्मा अमर रहती है । आगे वे कहते हैं कि संसार में नाना प्रकार के जीव है, मगर सबके हृदय में वह एक ही ईश्वर समाया हुआ है । संक्षेप में ईश्वर एक है, अजर-अमर है और सभी जीवों के हृदय में आत्मारूप में व्याप्त है ।
प्रश्न 4.
कबीर ने अपने को दीवाना क्यों कहा है ?
उत्तर :
‘दीवाना’ का सीधा-सादा अर्थ होता है – पागल । कबीर अपने निर्गुण-निराकार ब्रह्म की भक्ति में दीवाना हैं, पागल हैं, तन्मय हैं । उन्हें पता है कि यही सत्य और नित्य तत्त्व है । जबकि संसार विभिन्न प्रकार के आडम्बरों (व्रत, उपवास, तिलक, यात्रा आदि) में ईश्वर को ढूँढ़ रहा है । संसार का आडम्बर और बात है और कबीर की दीवानगी अलग बात है ।
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प्रश्न 5.
कबीर ने ऐसा क्यों कहा है कि संसार बौरा गया है ?
उत्तर :
‘बौरा जाना’ अर्थात् पागल हो जाना, उल्टे-सीधे काम करना । उनके अनुसार यह संसार बौरा (पागल) गया है, क्योंकि जो व्यक्ति सच बोलता है, उसे यह मारने को दौड़ता है । यह सच पर विश्वास नहीं करता और झूठी बातों पर विश्वास कर लेता है । कबीर कहते हैं नियम, स्नान, मूर्ति पूजा, आसन, पीपल-पूजन, तीर्थ, टोपी पहनना, माला पहनना, छाप, तिलक आदि लगाना आदि व्यर्थ का दिखावा है ।
ईश्वर एक ही है और वह बिना किसी आडंम्बर के सिर्फ सहज भक्ति मार्ग से प्राप्त हो सकता है। मगर संसार है कि कबीर की इस सच्ची बात पर विश्वास ही नहीं करता और उन्हें मारने को दौड़ता है, उनकी निंदा करता है। जबकि पाखंडियों की झूठी बातों पर विश्वास करता है । यही कारण है कि कबीर संसार को पागल कहते हैं ।
प्रश्न 6.
कबीर ने नियम और धर्म का पालन करनेवाले लोगों को किन कमियों की ओर संकेत किया है ?
उत्तर :
कबीर ने नियम और धर्म का पालन करनेवाले लोगों की निम्नलिखित कमियों (आडम्बरों) की ओर संकेत किया है – रोज नियम से स्नान करनेवाले, मूर्ति पूजा करनेवाले, आसन लगानेवाले, पीपल पूजनेवाले, तीर्थ करनेवाले, टोपी पहननेवाले, माला पहननेवाले, छाप-तिलक लगानेवाले आदि दंभी और अंधविश्वासी हैं ।
ऐसे सारे लोग आत्मज्ञान से वंचित है और वे धर्म के, ईश्वर के सच्चे स्वरूप को नहीं पहचान पाते । मुसलमान भी पवित्र कुरान का पाठ करते हैं, स्वयं को ईश्वर के सच्चे स्वरूप का ज्ञान न होने के बावजूद अपने शिष्यों को उपदेश देना, धार्मिक कट्टरता के कारण आपस में लड़ना, अपने ईश्वर को श्रेष्ठ बताना, घर-घर मंत्र देते फिरना आदि । वे भ्रमवश ईश्वर के सच्चे स्वरूप को पहचान नहीं पाते । जबकि ईश्वर तो सबके हृदय में विद्यमान हैं ।
प्रश्न 7.
अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्यों की क्या गति होती है ?
उत्तर :
अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्यों की दुर्गति होती है । कबीर के अनुसार घर-घर मंत्र देनेवाला और झूठे अभिमान में डूबा हुआ गुरु अपने शिष्यों को क्या सच्ची राह दिखायेगा ? ऐसे अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिष्य को अंतत: डूबने और पछताने के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता । कबीर इसी बात को अपने एक अन्य दोहे में यूँ कहते हैं –
“जाका गुरु भी अँधरा, चेला निपट निरंध ।
अंधा अंधे ठेलिया, दोनों कूप पड़त ।।”
प्रश्न 8.
बाह्य आडम्बरों की अपेक्षा स्वयं (आत्म) को पहचानने की बात किन पंक्तियों में कही गई है ? अपने शब्दों में लिखें ।
उत्तर :
कबीर ने बाह्य आडम्बरों की जगह स्वयं को पहचानने की बात निम्नलिखित पंक्तियों में कही गई है –
“टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना ।।”
इन पंक्तियों का आशय यह है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्म के सही रूप को पहचानने के बजाय मिथ्या बाह्य आडंबरों की होड़ में लीन हैं । कोई टोपी पहनता है, कोई माला पहनता है, कोई छाप लगाता है, कोई तिलक लगाता है । सानी और शब्द गाना भूल गये हैं । स्वयं अपने आत्मतत्त्व को पहचानना ही भूल गये हैं।
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पद के आसपास :
प्रश्न 1.
अन्य संत कवियों नानक, दादू और रैदास आदि के ईश्वर संबंधी विचारों का संग्रह करें और उन पर एक परिचर्चा करें ।
उत्तर :
कबीर, गुरु नानकदास, दादू दयाल, मलूकदास आदि निर्गुण संत कवि थे । ये सारे संत कवि एकेश्वरवाद का समर्थन करते हैं, बहुदेववाद का विरोध करते हैं । ईश्वर के निर्गुण – निराकार रूप का समर्थन और सगुण-साकार रूप का खंडन करते हैं । ईश्वर की सर्वव्यापकता में विश्वास करते हैं । ईश्वर अजर है, अमर है, अखंड है, अगम्य है, अगोचर है और उसे ज्ञानमार्ग तथा सहज भक्ति मार्ग से प्राप्त किया जा सकता है ।
प्रश्न 2.
कबीर के पदों को शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत दोनों में लयबद्ध भी किया गया है । जैसे कुमार गंधर्व, भारतीबंधु और प्रहलाद सिंह टिपाणियाँ आदि द्वारा गाए गए पद । इनके कैसेट्स अपने पुस्तकालय के लिए मंगवाएँ और पाठ्यपुस्तक के पदों को भी लयबद्ध करने का प्रयास करें।
उत्तर :
अध्यापक की मदद से यह कार्य कीजिए ।
Hindi Digest Std 11 GSEB हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौराना Important Questions and Answers
पद के साथ
प्रश्न 1.
“कहै कबीर सुनो हो संतो, ई सब मर्म भुलाना ।
केतिक कहीं कहा नहिं माने, सहजै सहज समाना ।।”
इन पंक्तियों का मर्म स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर :
प्रस्तुत पंक्तियों में कबीर ने संतों को, साधुजन को, विवेकीजन को संबोधित करते हुए कहा है कि मैं कई बार यह कंह-कर थक गया हूँ कि आत्मा और परमात्मा एक ही है, अलग-अलग नहीं हैं । मगर संसार भ्रमवश इन्हें अलग मानता है । वे अपने संतों, विवेकी लोगों को धार्मिक पाखंडों की व्यर्थता और भक्ति के सहज मार्ग को बताना चाहते हैं ।
योग्य विकल्प पसंद करके रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए ।
प्रश्न 1.
कबीर का जन्म सन् .. …. में हुआ था ।
(a) 1398
(b) 1399
(c) 1396
(d) 1395
उत्तर :
(a) 1398
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प्रश्न 2.
‘बीजक’ ग्रंथ के रचनाकार …………….. हैं ।
(a) कबीर
(b) रैदास
(c) मलूकदास
(d) दादू दयाल
उत्तर :
(a) कबीर
प्रश्न 3.
कबीर की मृत्यु सन् ……………….. में बस्ती के निकट मगहर में हुई थी।
(a) 1517
(b) 1518
(c) 1516
(d) 1515
उत्तर :
(b) 1518
प्रश्न 4.
कबीर का पालन-पोषण जुलाहा दम्पति ………….. ने किया था ।
(a) नीलम-नील
(b) ब्राह्मण
(c) नल-नील
(d) नीरू-नीमा
उत्तर :
(d) नीरू-नीमा
प्रश्न 5.
कबीर के गुरु . …….. थे।
(a) वल्लभाचार्य
(b) शंकराचार्य
(c) रामानंद
(d) विठ्ठलनाथ
उत्तर :
(c) रामानंद
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प्रश्न 6.
कबीर की पत्नी का नाम …………….. था ।
(a) लूना
(b) नागमती
(c) लोई
(d) ललिता
उत्तर :
(c) लोई
प्रश्न 7.
कबीर के पुत्र व पुत्री का नाम …. …… था ।
(a) कमल-कमला
(b) किशोर-किशोरी
(c) शंकर-गौरी
(d) कमाल-कमाली
उत्तर :
(d) कमाल-कमाली
प्रश्न 8.
कबीर भक्तिकाल के ………….. धारा के कवि हैं ।
(a) निर्गुण
(b) सगुण
(c) प्रेमाश्रयी
(d) कोई नहीं
उत्तर :
(a) निर्गुण
प्रश्न 9.
कबीर को …… ने वाणी का डिक्टेटर कहा है।
(a) आ. रामचन्द्र शुक्ल
(b) आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी
(c) नगेन्द्र
(d) नामवरसिंह
उत्तर :
(b) आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी
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प्रश्न 10.
कबीर कहते हैं कि …………. एक है।
(a) परमात्मा
(b) आत्मा
(c) लोग
(d) कोई नहीं
उत्तर :
(a) परमात्मा
प्रश्न 11.
कबीर के अनुसार आत्मा व परमात्मा को अलग-अलग मानकर ईश्वर को न पहचाननेवालों को …………….. की प्राप्ति होती
(a) स्वर्ग
(b) नरक
(c) पृथ्वी
(d) अमृत
उत्तर :
(b) नरक
प्रश्न 12.
शरीर नश्वर है परंतु ……………. अमर है ।
(a) ईश्वर
(b) बुद्धि
(c) आत्मा
(d) भक्ति
उत्तर :
(c) आत्मा
प्रश्न 13.
कवि ……………….. को पागल कहता है ।
(a) ब्राह्मणों
(b) पीर-औलिया
(c) लोगों
(d) संसार
उत्तर :
(d) संसार
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प्रश्न 14.
संसार सच बोलनेवालों को मारता है तथा झूठ बोलनेवाले पर ……. करता है ।
(a) विश्वास
(b) अविश्वास
(c) आघात
(d) प्रतिघात
उत्तर :
(a) विश्वास
प्रश्न 15.
……. गुरुओं व शिष्यों को अंततः में पछताना पड़ता है।
(a) घुमक्कड़
(b) सिद्ध
(c) ज्ञानी
(d) अज्ञानी
उत्तर :
(d) अज्ञानी
प्रश्न 16.
कबीर की भाषा ……………. है ।
(a) सरल
(b) कठिन
(c) तत्सम
(d) सधुक्कड़ी
उत्तर :
(d) सधुक्कड़ी
प्रश्न 17.
‘पीपर पाथर पूजन’ में …………… अलंकार है ।
(a) अनुप्रास
(b) रुपक
(c) उत्प्रेक्षा
(d) उपमा
उत्तर :
(a) अनुप्रास
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प्रश्न 18.
‘घर-घर’, ‘लरि-लरि’ में …………. अलंकार है ।
(a) संदेह
(b) यमक
(c) पुनरुक्ति प्रकाश
(d) श्लेष
उत्तर :
(c) पुनरुक्ति प्रकाश
अपठित पद्य
नीचे दी गई कविता को ध्यान से पढ़े, उस पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखें ।
इन्हीं तृण-फूस-छप्पर से
ढंके ढुलमुल गँवारू
झोंपड़ों में ही हमारा देश बसता है ।
इन्हीं के ढोल-मादल-बाँसुरी के
उमगते सुर में
हमारी साधना का रस बरसता है ।
इन्हीं के मर्म को अनजान
शहरों की ढ़की लोलुप
विषैली वासना का साँप डसता है ।
इन्हीं में लहरती अल्हड़
अयानी संस्कृति की दुर्दशा पर
सभ्यता का भूत हँसता है । – ‘अज्ञेय
प्रश्न 1.
हमारा देश कहाँ बसता है ?
उत्तर :
हमारा देश तृण-फूस के छप्परोंवाले गाँव के झोंपड़ों में बसता है ।
प्रश्न 2.
ढोल-मादल और बाँसुरी हमारे देश के किन निवासियों की पहचान है ? और ये कहाँ रहते हैं ?
उत्तर :
ढोल-मादल और बाँसुरी हमारे देश के आदिवासियों की पहचान है । ये आदिवासी शहर-कस्बों से दूर-दराज के यनप्रदेशों में बसते हैं ।
प्रश्न 3.
इस कविता का केन्द्रीय भाव क्या है ?
उत्तर :
असली भारत गाँवों में बसता है । आज शहरी जीवन की लोलुप वासना का विष उन भोलेभाले लोगों के जीवन को दूभर किये जा रहा है।
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प्रश्न 4.
‘अयानी संस्कृति की’ का क्या तात्पर्य है ?
उत्तर :
अयानी संस्कृति का तात्पर्य है, वह संस्कृति जिसमें यान (चाहन) नहीं थे । लोग भोलेभाले थे ।
प्रश्न 5.
इस कविता का उचित शीर्षक दीजिए ।
उत्तर :
‘हमारा देश’ – शीर्षक ।
हम तौ एक एक करि जाना, संतों देखत जग बौराना Summary in Hindi
कवि परिचय :
नाम – कबीर
जन्म – सन् 1398, वाराणसी के पास ‘लहरतारा’ (उत्तर प्रदेश)
प्रमुख रचनाएँ – ‘बीजक’ जिसमें सारखी, सबद एवं रमैनी संकलित हैं ।
– कबीर ग्रंथावली
– गुरु ग्रंथ साहब में कुछ रचनाएँ संग्रह की गई हैं ।
– सन् 1518 में बस्ती के निकट मगहर में ।
कबीर की जन्मतिथि के संबंध में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं । ऐसा भी माना जाता है कि कबीर का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, जिसने लोकलाज के भय से उन्हें काशी के लहरतारा नामक तालाब के किनारे फेंक दिया था तथा उधर से गुजरनेवाले जुलाहा जाति के निःसंतान दम्पति नीरू-नीमा ने उन्हें वहाँ से उठाकर अपने घर लाकर पालन-पोषण किया ।
कबीर आगे चलकर रामानंद के शिष्य हो गए । उन्होंने लिखा भी है – ‘कासी में हम प्रगट भये रामानंद चेताये’ । कबीर का विवाह लोई नामक एक साध्वी से हुआ था जिससे उनके कमाल नामक पुत्र और कमाली नामक पुत्री का जन्म हुआ । संत कबीर का व्यक्तित्व हिंदी साहित्य के संत कवियों में अद्वितीय है ।
कबीर की टक्कर का फक्कड़, मस्तमौला, प्रतिभाशाली एवं महिमामंडित व्यक्तित्व आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास जी को छोड़कर और कोई नहीं दिखाई देता । उनके व्यक्तित्व को किसी बने बनाए चौखटे में जकडकर मल्यांकित नहीं किया जा सकता । उनका बहु-आयामी व्यक्तित्व बड़ा ही विविधतापूर्ण एवं व्यापक है।
इसीलिए तो कबीर पर जिसकी भी जिस दृष्टिकोण से नजर पड़ी है, उसने उन्हें उसी के अनुरूप रेखाकिंत करने की कोशिश की है । तभी तो किसी ने उन्हें तत्त्वदर्शी, किसी ने योगमार्गी, किसी ने सूफीमत का ऋणी, किसी ने श्रमण संस्कृति का उपकृत, किसी ने वैष्णव भक्त, किसी ने अद्वैतवादी, किसी ने निर्गुण – निराकारोपासक, किसी ने आत्मनिष्ठ, किसी ने मानवतावादी, किसी ने सुधारवादी, किसी ने विद्रोही क्रांतिकारी, किसी ने सारग्रही समन्वयवादी तो किसी ने स्वतंत्र मौलिक चिंतक की उपाधियों से अलंकृत किया है ।
‘मसि कागद छूयो नहि, कलम गहिं नहि हात’ के बावजूद भी कबीर पढ़े-लिखों से अधिक समझदार, विवेकी एवं ज्ञानी थे । उन्हें तो ‘कागद की लेखी’ से ‘आँखिन की देखी’ पर अधिक भरोसा था । तभी तो उन्होंने लिखा है – ‘तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी’ । कबीर की वाणी कबीर के अनुभव-प्रसूत उद्गार हैं । कबीर के व्यक्तित्व में कथनी, करनी और रहनी का आदर्श समाया हुआ है ।
कबीर भक्तिकाल की निर्गुण धारा (ज्ञानाश्रयी शाखा) के प्रतिनिधि कवि हैं । वे अपनी बात को साफ एवं दो टूक शब्दों में प्रभावी ढंग से कह देने के हिमायती थे, ‘बन पड़े तो सीधे-सीधे नहीं तो दरेरा देकर’ । इसलिए कबीर को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को पंचरंगी मिली-जुली भाषा कहा है ।
इसे उन्होंने ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा है । उन्होंने देशाटन और सत्संग से ज्ञान प्राप्त किया । किताबी ज्ञान के स्थान पर आँखों देखा सत्य और अनुभव को प्रमुखता दी । उनकी रचनाओं में नाथों, सिद्धों और सूफी संतों की बातों का प्रभाव मिलता है । वे कर्मकांड और वेद-विचार के विरोधी थे तथा जाति-भेद, वर्ण-भेद और संप्रदाय-भेद के स्थान पर प्रेम, सद्भावना और समानता का समर्थन करते थे ।
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काव्य का सारांश :
यहाँ प्रस्तुत पहले पद में कबीर ने परमात्मा को सृष्टि के कण-कण में देखा है, ज्योतिरूप में स्वीकारा है तथा उसकी व्याप्ति चराचर संसार में दिखाई है । इसी व्याप्ति को अद्वैत सत्ता के रूप में देखते हुए विभिन्न उदाहरणों के द्वारा रचनात्मक अभिव्यक्ति दी है । कबीरदास ने आत्मा और परमात्मा को एक रूप में ही देखा है ।
संसार के लोग अज्ञानवश इन्हें अलग-अलग मानते हैं । कवि पानी, पवन, प्रकाश आदि के उदाहरण देकर उन्हें एक जैसा बताता है । बाढ़ई लकड़ी को काटता है, परंतु आग को कोई नहीं काट सकता । परमात्मा सभी के हृदय में विद्यमान है । माया के कारण इसमें अंतर दिखाई देता है । दूसरे पद में कबीर ने बाह्य आडम्बरों पर प्रहार करते हुए कहा है कि अधिकतर लोग अपने भीतर की ताकत को न पहचानकर अनजाने में अवास्तविक, मिथ्या जगत से रिश्ता बना बैठते हैं और वास्तविक जगत से बेखबर रहते हैं ।
कवि के अनुसार यह संसार पागल हो गया है । यहाँ सच कहनेवाले का विरोध तथा झूठ पर विश्वास किया जाता है । हिंदू और मुसलमान राम और रहीम के नाम पर लड़ रहे हैं, जबकि दोनों ही ईश्वर का मर्म नहीं जानते । दोनों बाह्य आडंबरों में उलझे हुए हैं । नियम, धर्म, टोपी, माला, छाप, तिलक, पीर, ऑलिया, पत्थर पूजनेवाले और कुरान की व्याख्या करनेवाले खोखले गुरु-शिष्यों को आडंबर बताकर उनकी निंदा की गई है।
पद व्याख्या
पद 1
हम तौ एक एक करि जांनां ।
दोह कहैं तिनहीं की दोजग जिन नाहिंन पहिचांनां ।।
एकै पवन एक ही पानी एकै जोति समांनां ।
एकै खाक गढ़े सब भांडै एकै कोहरा सांनां ।।
जैसे बाढ़ी काष्ट ही काटै अगिनि न काटे कोई ।
सब घटि अंतरि तूंही व्यापक धरै सरूपै सोई ।।
माया देखि के जगत लुभांना काहे रे नर गरबांनां ।
निरभै भया कळू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवांनां ।।
कबीर भक्तिकालीन निर्गुण शाखा के ज्ञानमार्गी संत कवि थे । निर्गुण कवि एकेश्वरवाद में मानते हैं । उनके मतानुसार ईश्वर एक है । हम सब उसी अंशी के अंश हैं । यह बात उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के द्वारा कही है।
कबीर को यह ज्ञान हो गया है कि सृष्टि का सर्जनहार परमात्मा एक ही है । इसलिए ये बड़े आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि हमने तो जान लिया है ईश्वर एक ही है । ईश्वर हमसे अलग है ही नहीं । उसकी अद्वैतता को हमने पहचान लिया है । जिन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि ईश्वर एक है वे मानों नरक में ही रह रहे हैं ।
क्योंकि वे इस ज्ञान को जानते ही नहीं । वे (अज्ञानी) जीवात्मा और परमात्मा को अलग-अलग मानते हैं । फिर वे ईश्वर की अद्वैतता की पुष्टि में कुछ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि संसार में एक जैसा पवन बहता है, एक जैसा पानी है और एक ही ज्योति सभी में व्याप्त है । कुम्हार भी एक ही तरह की मिट्टी से सब प्रकार के बर्तन बनाता है । हाँ, उनका आकार-प्रकार अलग-अलग हो सकता है ।
जैसे बढ़ई लकड़ी को तो काट सकता है, मगर उसके भीतर की अग्नि को नहीं काट सकता । इसी प्रकार शरीर नष्ट हो जाता है किंतु उसमें व्याप्त आत्मा नष्ट नहीं होती, वह सदैव रहती है । इसी प्रकार ईश्वर सब में व्याप्त है, अनेक रूपों में व्याप्त है । आगे कबीर कहते हैं कि यह संसार मोह-माया में व्यर्थ ही फँसा हुआ है ।
यह मोह-माया जीव को आकर्षित करती है, लुभावती है । जब संसार असार है तो मनुष्य व्यर्थ ही घमंड करता है । जब मनुष्य निर्भय हो जाता है फिर उसे किस बात की चिन्ता । कबीर उस निर्गुण निराकार में एकाकार होकर दीवाना हो गया है । यह दीवानगी ही उसकी निर्भयता का कारण है ।
पद 2
संतों देखत जग बौराना । साँच कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना ।।
नेमी देखा धरमी देखा, प्रात करै असनाना ।
आतम मारि पखानहि पूजै, उनमें कछु नहिं ज्ञाना ।।
बहुतक देखा पीर औलिया, पढ़े कितेब कुराना ।
कै मुरीद तदबीर बतावै, उनमें उहै जो ज्ञाना ।।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना ।
पीपर पाथर पूजन लागे, तीरथ गर्व भुलाना ।।
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना ।
साखी सब्दहि गावत भूले, आतम खबरि न जाना ।
हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुर्क कहै रहिमाना ।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना ।
घर घर मन्तर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना ।
गुरु के सहित सिख्य सब बूड़े, अंतः काल पछिताना ।
कहै कबीर सुनो हो संतों, ई सब भर्म भुलाना ।
केतिक कहीं कहा नहिं माने, सहजै सहज समाना ।।
प्रस्तुत पद में कबीर ने धार्मिक कर्मकाण्डों एवं विभिन्न बाह्याचारों पर तीखा व्यंग्य किया है ।
वे साधुजनों को, सज्जनों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि, देखो ये जगत पगला गया है । जो व्यक्ति सच्ची-सच्ची बातें बतलता है, खरी-खरी कहता है उसे यह संसार मारने के लिए दौड़ता है । इससे उल्टा जो व्यक्ति झूठ बोलता है उस पर यह विश्वास कर लेता है । कबीर हिन्दुओं के बारे में बताता है कि मैंने ऐसे कई लोग देखें हैं जो नियमों का पालन करते हैं, ऐसे कई धार्मिक वृत्ति के लोग देखें हैं जो विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान आदि करते हैं । नित्य प्रातः उठकर स्नान करते हैं ।
ये अपनी आत्मा को न पहचान कर उसका हनन करके पत्थरों को पूजते फिरते हैं । आत्म को जाने बिना, ये न तो स्व को जानते हैं और न ही आत्मचिंतन करते हैं । मिथ्या ही अपने ज्ञान पर घमण्ड करते हैं । जबकि उन्होंने कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं किया है । कबीर मुसलमानों के द्वारा धर्म के नाम पर हो रहे बाह्य आडम्बरों पर भी तीखा प्रहार किया है । वे कहते हैं कि मैंने ऐसे अनेक पीर, ओलिया देख्ने जो पवित्र कुरान का नियमित पाठ करते हैं । वे अपने शिष्यों को तरह-तरह के उपाय और उपदेश देते हैं ।
जबकि ऐसे पाखण्डी स्वयं खुदा के बारे में कुछ नहीं जानते वे अपने शिष्यों को क्या बताएँगें । वे ऐसे ढोंगी, योगियों पर भी करारी चोंट करते हैं जो आसन लगाकर अहंकार में डूबे हुए हैं । कबीरदास लोगों के बाह्य आडम्बरों पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि लोग पीपल, पत्थर को पूजने लगे हैं, तीर्थयात्रा करके मिथ्या गर्व में डूबे रहते हैं उस निर्गुण को भूल जाते हैं ।
कुछ लोग टोपी पहनते हैं, माला धारण करते हैं, शरीर पर छाप, तिलक और न जाने क्या-क्या बनाते हैं । वे साखी और सबद गाना भूल गये हैं । उन्हें अपनी खुद की खबर नहीं है । कबीर हिन्दू और मुसलमान दोनों की धार्मिक कट्टरता पर भी तीखा व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि हिन्दू कहता है कि मुझे राम प्यारे हैं और तुर्क (मुस्लिम) कहते हैं कि मुझे रहमान प्यारे हैं ।
वे आपस में ही लड़-लड़ कर मर जाते हैं । मगर राम-रहीम का मर्म नहीं समझते हैं । उसकी (निर्गुण) सत्ता के रहस्य को कोई जानने की कोशिश नहीं करता । ऐसे झूठी, दंभी और पाखण्डी लोग घर-घर जाकर लोगों को मंत्र देते फिरते हैं । उन्हें सांसारिक मोह-माया का बहुत अभिमान है । ऐसे गुरु-शिष्य दोनों अज्ञान में डूबे हुए हैं । इन लोगों को अंततः पछताना ही पड़ेगा ।
कबीर फिर सज्जनों को, साधुजनों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे संतो ! वे लोग माया को सब कुछ मानते हैं तथा हरि नाम को भूल गए हैं । आगे यह कहते हैं कि इन्हें चाहे कितना भी समझाओ ये नहीं मानते । यह भी सच है कि ईश्वर तो सहज भाव से रहनेवालों को सहज ही मिल जाते हैं ।
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शब्दार्थ :
- दोजग (फा. दोज़ख्न) – नरक
- खाक – मिट्टी
- सांना – एक साथ मिलाकर, (गूँथना)
- अंतरि – भीतर, अंदर
- गरबांनां – गर्व करना
- बौराना – बुद्धि भ्रष्ट हो जाना, पगला जाना
- पतियाना – विश्वास करना
- धरमी – धार्मिक, धर्म का पाखंड़ करनेवाला
- आतम – स्वयं
- बहुतक – बहुत से
- कुराना – कुरान शरीफ़ (इस्लाम धर्म की धार्मिक पुस्तक है।)
- तदबीर – उपाय
- डिंभ धरि – दंभ करके, आडंम्बर करके
- पीपर – पीपल का वृक्ष
- छाप तिलक अनुमान – मस्तक पर विभिन्न प्रकार के तिलक लगाना
- आतम खबरि – आत्मज्ञान, आत्मतत्त्व का ज्ञान
- महिमा – महात्म्य
- दोई – दो
- नाहिंन – नहीं
- सिख्य – शिष्य
- समाना – व्याप्त, समाया, लीन होना
- भांडे – बर्तन
- अगिनि – आग
- सरुपै – स्वरुप
- कितेब – ग्रंथ, किताब
- तदबीर – उपाय
- मोहि – मुझे
- दोउ – दोनों
- मुए – मरना
- काहू – किसी ने
- समांनां – व्याप्त
- कोहरा – कुम्हार, कुंभकार
- बाढ़ी – बढ़ई
- सरूपै – स्वरूप
- निरभै – निर्भय
- धावै – दौड़ते हैं
- नेमी – नियमों का पालन करनेवाला
- असनाना – स्नान करना, नहाना
- पखानहि – पत्थर को, पत्थरों की मूर्तियों का
- पीर औलिया – धर्मगुरु और संत, ज्ञानी
- मुरीद – शिष्य, अनुगामी
- आसन मारि – समाधि या ध्यान मुद्रा में बैठना
- गुमाना – अहंकार
- पाथर – पत्थर
- साखी – साक्षी, गवाह, स्वयं अपनी आँखों देखे तथ्य का वर्णन
- सब्दहि – वह मंत्र जो गुरु शिष्य को दीक्षा के अवसर पर देता है, सबद पद के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, आप्त वचन
- रहिमाना – रहम करनेवाला, दयालु
- तिनहीं – उनको
- गढ़े – रचे हुए
- काष्ट – लकड़ी
- घटि – घड़ा, हृदय
- सोई – वही
- दिवानां – बैरागी
- मुरीद – शिष्य
- पहिरे – पहने
- तुर्क – मुस्लमान (तुर्की का निवासी)
- लरि – लड़ना
- मर्म – रहस्य
- बूड़े – डूबे
- भर्म – संदेह, भ्रम
- सहजै – सहज रूप से
- मन्तर – मंत्र, गुप्त वाक्य बताना
- अंतकाल – अंतिम समय
- केतकि कहीं – कहाँ तक कहूँ ।